जय जगन्नाथ! पुरी, ओडिशा में स्थित जगन्नाथ मंदिर सिर्फ एक इमारत नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र है जहाँ भक्ति, इतिहास और कला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह मंदिर, जो भगवान जगन्नाथ (भगवान कृष्ण का एक रूप) को समर्पित है, हिंदू धर्म के चार धामों में से एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। इसकी भव्यता और आध्यात्मिक महत्ता को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे हर कोने में देवताओं की कृपा बिखरी हो।
पौराणिक शुरुआत
कहानी शुरू होती है सतयुग से, जब एक भक्त राजा इन्द्रद्युम्न, जो मालवा के शासक थे, भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्हें एक सपना आया जिसमें भगवान विष्णु ने कहा कि पुरी के पुरुषोत्तम क्षेत्र में उनका एक मंदिर बनाया जाए और एक दिव्य लकड़ी से उनकी मूर्ति तैयार की जाए। इन्द्रद्युम्न ने अपने पुजारी विद्यापति को भेजा ताकि वह एक देवता नील माधव को खोजे, जिसकी गुप्त रूप से पूजा एक आदिवासी प्रमुख विश्ववासु द्वारा ओडिशा के जंगलों में की जाती थी।
विद्यापति ने विश्ववासु की बेटी ललिता से विवाह किया और नील माधव का पता लगाया। लेकिन जब इन्द्रद्युम्न वहाँ पहुँचे, तो नील माधव गायब हो गया क्योंकि भगवान चाहते थे कि वे सबके लिए एक सुलभ रूप में प्रकट हों—जगन्नाथ के रूप में। इन्द्रद्युम्न ने क्रोध त्याग दिया और नील पर्वत पर उपवास शुरू कर दिया। तब एक दिव्य वाणी ने कहा कि भगवान विष्णु उन्हें जगन्नाथ के रूप में दर्शन देंगे।
एक और स्वप्न में, इन्द्रद्युम्न को समुद्र में एक विशाल लकड़ी का टुकड़ा मिला जो किसी दिव्य स्रोत से आया था। यह लकड़ी इतनी भारी थी कि कोई भी उसे हिला नहीं पाया, पर विश्ववासु के एक वंशज, एक साधारण सबर (आदिवासी) ने इसे आसानी से उठा लिया। फिर विश्वकर्मा (या एक वेशधारी बढ़ई) ने उस लकड़ी से जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की मूर्तियाँ बनाईं। लेकिन इन्द्रद्युम्न की जिज्ञासा के कारण, जब उन्होंने मूर्तियों के निर्माण के बीच में झाँका, तो मूर्तियाँ अधूरी रह गईं—ना हाथ, ना पैर। तब दिव्य वाणी ने कहा कि यही रूप परिपूर्ण है, और ब्रह्मा ने मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की।
यह कथा स्कंद पुराण में मिलती है, जिसमें जगन्नाथ को “दारु ब्रह्म” कहा गया है—अर्थात लकड़ी के रूप में परम ब्रह्म, जो हर जाति, हर समुदाय के लिए सुलभ है।
जगन्नाथ मंदिर के रोचक तथ्य
यहाँ कुछ अद्भुत तथ्य हैं जो जगन्नाथ मंदिर को और भी विशेष बनाते हैं:
🔸 ध्वज का चमत्कार: मंदिर के शीर्ष पर जो ध्वज (पतितपावन बाना) है, वह हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। यह ध्वज प्रतिदिन बदला जाता है, और एक व्यक्ति खुद चढ़कर इसे बदलता है।
🔸 मंदिर की छाया नहीं पड़ती: मंदिर के मुख्य गुंबद (नीलचक्र) की कोई भी छाया जमीन पर नहीं पड़ती, चाहे दिन का कोई भी समय क्यों न हो। यह एक अद्भुत वास्तुकला रहस्य है।
🔸 मूर्तियों का अनोखा निर्माण: जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ नीम की लकड़ी से बनाई जाती हैं, और हर 12 से 19 वर्षों में नवकलेवर नामक विशेष अनुष्ठान में इन्हें बदला जाता है।
🔸 रसोई का चमत्कार: मंदिर की रसोई (आनंद बाजार) को दुनिया की सबसे बड़ी रसोई माना जाता है, जहाँ 56 प्रकार के व्यंजन (छप्पन भोग) बनाए जाते हैं। और यह भी कहा जाता है कि प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं होता, चाहे कितने भी भक्त आएँ।
🔸 समुद्र की आवाज़ का रहस्य: मंदिर के पास समुद्र की आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है, लेकिन जैसे ही आप मंदिर के मुख्य द्वार (सिंहद्वार) को पार करते हैं, यह आवाज़ पूरी तरह गायब हो जाती है।
🔸 कोई पक्षी या विमान नहीं उड़ता: मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी या विमान नहीं उड़ता, जो आज तक एक रहस्यमयी और अबूझ घटना मानी जाती है।
रथ यात्रा 2025: कब और कैसे?
इस साल रथ यात्रा 27 जून 2025 को है। वैसे तो यह पर्व पूरे 9 दिनों तक चलता है और इसका एक अहम भाग होता है “बहुदा यात्रा” या वापसी की यात्रा, जो 5 जुलाई 2025 को मनाई जाएगी। इस उत्सव के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विशाल लकड़ी के रथों में विराजमान किया जाता है और उन्हें जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है, जो लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित है।
इन रथों को भक्तजन रस्सियों से खींचते हैं, और ये रथ बहुत ही भव्य और सुंदर होते हैं। हर रथ का अपना अलग डिजाइन और नाम होता है।
यह मंदिर न सिर्फ श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि यह एक ऐसा स्थल है जो हर बार दर्शन करने पर भक्ति, चमत्कार और संस्कृति का अद्वितीय अनुभव कराता है।
- Epstein Files: 2026’s Massive 3-Million-Page Disclosure and Its Global Impact
- Union Budget 2026: Key Highlights, New Tax Slabs, and Sectoral Impact
- Toxic Movie Teaser Out: Rocking Star Returns as Raya in High-Octane ‘Fairytale for Grown-Ups’
- PDF4me is the Best Free All-in-One Tool of 2026
- Venezuela Crisis 2026
